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खाने का स्वाद बढ़ा देता है पत्थर का यह टुकड़ा

Reported by nationalvoice , Edited by shabahat.vijeta , Last Updated: Apr 17 2019 3:21PM
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काशीपुर. आज के आधुनिक युग में जहां सभी कुछ आधुनिक हो गया है वहीं आज भी प्राचीन वस्तुओं का अपना अलग ही महत्व है. अभी भी लोगों का मानना है कि खाने के साथ चटनी का मजा पत्थर के सिल बट्टे पर हाथ से बनी चटनी में ही आता है. काशीपुर के चैती मेले में सिल बट्टा व चक्की के पार्टस बनाने वाले कारीगर सबसे पहले आकर सबसे आखिर में जाते हैं तथा पूरे मेले में अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए चिलचिलाती धूप में भी पत्थर को तराश कर उन्हें नया रूप देने में लगे हैं.

काशीपुर में लगने वाले चैती मेले में पत्थर तराशती इन महिलाओं को देखकर एक प्रसिद्ध कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की पंक्तियां याद आ जाती हैं. जिन्होंने अपनी कविता वह तोड़ती पत्थर में लिखा था कि " वह तोड़ती पत्थर, देखा उसे मैने इलाहाबाद के पथ पर, वह तोड़ती पत्थर, चढ़ रही थी धूप गर्मियों के थे दिन, दिवा का तमतमाता रूप उठी झुलसाती हुई लू, रुई ज्यों जलती हुई भू, गर्द चिनगी छा गयी प्रातः हुई दोपहर, वह तोड़ती पत्थर. "  मूलतः पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के कांजीसराय मोहल्ले से आने वाले ये कारीगर पत्थरों को तराशकर सिल बट्टा तथा आटे की चक्की आदि बनाते हैं तथा अपना तथा अपने परिवार का पेट पालते हैं.

गर्मी के दिनों में चैती मेले में सबसे पहले आकर सबसे आखिर में जाने वाले इन कारीगरों के यहां यह काम पुराने जमाने से होता चला आ रहा है. पत्थर को तराशकर उसे सिलबट्टा, खरल, व चक्की का रूप देना इनका पेशा है. जिससे लोग अपना आनाज अपने हाथों से पीसते हैं और सब्जी में प्रयोग होने वाले मसाले भी खुद बनाते हैं. कारीगरों के मुताबिक़ पत्थर की चक्की और सिल बट्टे पर चटनी पीसने से किसी भी तरह कि बीमारी नहीं होती साथ ही इसके पिसे मसाले और चटनी से खाने में स्वाद तो आता ही है. साथ ही इस पर मसाले और दलिया, दालें चटनी पीसने से शरीर फुर्तीला बना रहता है.

ये गरीब लोग इसी से अपनी रोजी रोटी चलाते हैं परंतु गरीबों के लिए जो योजनाएं सरकार चला रही है उनका लाभ ये लोग नहीं ले पाते इसका मुख्य कारण इन लोगों को सरकार की योजनाओं की जानकारी न होना है. इसके साथ ही मेला सरकारी तो हुआ जहां मेला सरकारी होने से इन कारीगरों को उम्मीद बंधी थी कि उनका रोजगार और तरक्की करेगा लेकिन प्रशासन की दबंगई के कारण इन्हें सड़क किनारे से हटाकर काफी अंदर धकेल दिया गया. साथ ही इनसे प्रशासन के द्वारा 2 से 3 गुना किराया लिया गया. इन लोगों के मुताबिक इन लोगों पर रोजी रोटी का संकट भी गहरा गया है क्योंकि चैती मेले हर साल सड़क किनारे अपना सिलबट्टा का कारोबार चलाने वाले इन गरीबों की कारीगरी के शौकीन अब इनके पास तक नहीं पहुंच पा रहे हैं तो इनके मुताबिक वहीं दूसरी तरफ जहां इन्हें स्थान दिया गया है वही सुविधाओं के नाम पर सब कुछ शून्य है और यह सब कारीगर इसके लिए प्रशासन को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. उनके मुताबिक प्रशासन ने ठेकेदारों को मेले को ठेके पर दे दिया और ठेकेदार के द्वारा इनका उत्पीड़न किया जा रहा है.


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